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BHEL Share News: मुनाफे में 120% की तूफानी बढ़त, फिर भी क्यों गिरे शेयर? जानिए क्या है असली वजह

  BHEL Share News: मुनाफे में 120% की तूफानी बढ़त और ₹2.6 लाख करोड़ की रिकॉर्ड ऑर्डर बुक, क्या अब आएगी शेयरों में बड़ी तेजी? भारतीय शेयर बाज...

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BHEL Share News: मुनाफे में 120% की तूफानी बढ़त, फिर भी क्यों गिरे शेयर? जानिए क्या है असली वजह

 

BHEL Share News: मुनाफे में 120% की तूफानी बढ़त और ₹2.6 लाख करोड़ की रिकॉर्ड ऑर्डर बुक, क्या अब आएगी शेयरों में बड़ी तेजी?



भारतीय शेयर बाजार में सरकारी कंपनियों (PSU Stocks) की हलचल के बीच भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) के शेयरों पर हर निवेशक की नजर बनी हुई है। कंपनी ने हाल ही में अपने चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के जो वित्तीय नतीजे पेश किए हैं, उसने हर किसी को चौंका दिया है। हालांकि, ब्लॉकबस्टर नतीजों के ठीक बाद शेयरों में हल्की मुनाफावसूली और उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।

आज के कारोबारी सत्र में BHEL का शेयर लगभग 3.57% की गिरावट के साथ ₹387.60 के स्तर पर बंद हुआ। लेकिन अगर लंबी अवधि की बात करें, तो पिछले एक साल में इस दिग्गज स्टॉक ने अपने निवेशकों को 50% से ज्यादा का शानदार रिटर्न कमा कर दिया है। आइए गहराई से समझते हैं कि कंपनी के भीतर चल क्या रहा है और आने वाले दिनों में इसकी दिशा क्या हो सकती है।


दूसरी तिमाही के नतीजे: मुनाफे में भारी उछाल


कंपनी के हालिया वित्तीय आंकड़े यह साफ बताते हैं कि इसके बुनियादी कामकाज में बड़ा सुधार हुआ है:

• शुद्ध लाभ (Net Profit): सालाना आधार पर कंपनी का मुनाफा 120% बढ़कर ₹810 करोड़ के पार पहुंच गया है, जो पिछले साल की इसी तिमाही में ₹375 करोड़ के आसपास था।

• कुल राजस्व (Revenue): इस तिमाही में कंपनी की कुल कमाई भी 24% की शानदार बढ़त के साथ ₹9,300 करोड़ को पार कर गई है।

शानदार नतीजों के बाद भी गिरावट क्यों?

बाजार के जानकारों का मानना है कि जब कोई शेयर लगातार दौड़ता है, तो अच्छे नतीजों के बाद बड़े निवेशक निचले स्तरों पर कमाया हुआ मुनाफा बटोरना (Profit Booking) शुरू कर देते हैं। इसके अलावा, हालिया तेजी के बाद शेयर की कीमतें इसके वास्तविक मूल्यांकन से थोड़ी आगे निकल गई थीं, जिसके कारण यह शॉर्ट-टर्म करेक्शन देखने को मिल रहा है।


₹2.57 लाख करोड़ की महा-ऑर्डर बुक: भविष्य सुरक्षित


BHEL की सबसे बड़ी ताकत उसकी ऑर्डर बुक है, जो इस समय ₹2,57,571 करोड़ (लगभग ₹2.6 लाख करोड़) के ऐतिहासिक स्तर पर है। यह आंकड़ा कंपनी के पास काम की कोई कमी न होने की गारंटी देता है।

दिलचस्प बात यह है कि अब कंपनी सिर्फ बिजली के उपकरण (Thermal Power) बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने अपने पोर्टफोलियो का बेहतरीन विविधीकरण (Diversification) किया है:

• रेलवे और इंफ्रास्ट्रक्चर: वंदे भारत ट्रेनों के निर्माण और आधुनिक रेलवे प्रोजेक्ट्स में बड़ी हिस्सेदारी।

• डिफेंस और न्यूक्लियर सेक्टर: आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत सेना के लिए स्वदेशी रक्षा उपकरणों का निर्माण।

• ग्रीन एनर्जी: आने वाले समय के लिए ग्रीन हाइड्रोजन और रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम।


आगे की राह: निवेशकों को क्या करना चाहिए?


तकनीकी चार्ट्स और बाजार के सेंटिमेंट को देखें तो BHEL का स्टॉक एक मजबूत कंसॉलिडेशन (दायरे में कारोबार) के दौर से गुजर रहा है:

• तेजी का परिदृश्य: यदि यह शेयर ऊपरी स्तरों पर अपने तात्कालिक प्रतिरोध (Resistance) को पार कर लेता है, तो इसमें बहुत जल्द ₹480 से ₹490 तक के नए स्तर देखने को मिल सकते हैं। पावर और डिफेंस सेक्टर्स में सरकार का लगातार बढ़ता खर्च इस तेजी को लंबी अवधि तक सहारा देगा।

• सावधानी का पहलू: ऑर्डर्स मिलना एक बात है, लेकिन इतने विशालकाय प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करना (Execution) कंपनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। इसलिए, रिटेल निवेशकों को किसी भी बड़ी गिरावट में धीरे-धीरे (SIP मोड में) ही एंट्री करने की सलाह दी जाती है।

निष्कर्ष:

शॉर्ट-टर्म का उतार-चढ़ाव बाजार का हिस्सा है, लेकिन ₹2.6 लाख करोड़ की ऑर्डर बुक और मुनाफे की 120% रफ्तार यह साबित करती है कि BHEL आने वाले सालों में भारतीय पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर स्पेस का एक बड़ा खिलाड़ी बना रहेगा।

(डिस्क्लेमर: यह लेख केवल शैक्षिक और ब्लॉगिंग उद्देश्यों के लिए है। शेयर बाजार में निवेश जोखिमों के अधीन है, कृपया कोई भी कदम उठाने से पहले खुद रिसर्च करें या प्रमाणित वित्तीय सलाहकार की मदद लें।)

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की मां काशीबाई का निधन, भोपाल एम्स में ली अंतिम सांस

 

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की मां काशीबाई का निधन: 76 साल की उम्र में ली अंतिम सांस, भोपाल एम्स में थीं भर्ती




भोपाल। केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पूजनीय माता श्रीमती काशीबाई चौहान का आज निधन हो गया है। उन्होंने 76 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। वह पिछले लगभग एक सप्ताह से भोपाल के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में गंभीर हालत में भर्ती थीं और वेंटिलेटर सपोर्ट पर चल रही थीं।

उनके निधन की खबर सामने आते ही पूरे प्रदेश और राजनीतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।


भोपाल एम्स में चल रहा था इलाज


पारिवारिक सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, श्रीमती काशीबाई पिछले कुछ समय से उम्र से संबंधित गंभीर बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं। तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें भोपाल एम्स के आईसीयू (ICU) वार्ड में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों की एक विशेष टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही थी और उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था, लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ और आज उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।


राजनीतिक और सामाजिक जगत में शोक


शिवराज सिंह चौहान की माता के निधन पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, विभिन्न मंत्रियों, भाजपा और विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं ने गहरा दुख व्यक्त किया है। सभी नेताओं ने शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट की हैं और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की है।


"ॐ शांति! ईश्वर दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जी एवं समस्त शोक संतप्त परिजनों को इस असहनीय दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। भावभीनी श्रद्धांजलि!"

भोपाल में गैस संकट: किल्लत का बहाना बना अटके 18 हजार कनेक्शन, दोगुने दाम पर छोटे सिलेंडर खरीदने को मजबूर लोग

 

भोपाल में गैस संकट: किल्लत का बहाना बना अटके 18 हजार कनेक्शन, दोगुने दाम पर छोटे सिलेंडर खरीदने को मजबूर लोग



भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में इन दिनों रसोई गैस उपभोक्ताओं को एक अभूतपूर्व और गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। गैस कंपनियों द्वारा कथित तौर पर 'रॉ मटेरियल की किल्लत' और 'अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों' का ढाल बनाकर पिछले 9 महीनों से नए एलपीजी (LPG) और पीएनजी (PNG) गैस कनेक्शनों की फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। सरकारी दावों और डिजिटल इंडिया के नारों के बीच जमीनी हकीकत यह है कि भोपाल के करीब 18,000 से अधिक परिवार एक अदद वैध गैस कनेक्शन के लिए महीनों से सरकारी और निजी गैस एजेंसियों के चक्कर काट रहे हैं।

गैस कंपनियों के इस लचर और उदासीन रवैये ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। सबसे ज्यादा मार उन नए परिवारों और प्रवासियों पर पड़ रही है जो हाल ही में शहर में बसे हैं। अपनी रसोई का चूल्हा जलाने के लिए उपभोक्ताओं के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है, जिसके कारण वे बाजार से दोगुने से भी अधिक दामों पर 5 किलो और 10 किलो वाले छोटे कमर्शियल सिलेंडर खरीदने को मजबूर हैं।


त्योहारों के सीजन में चरम पर पहुंचा संकट, दफ्तरों में मची है हाहाकार


वर्तमान में जारी त्योहारों के इस व्यस्त सीजन ने इस समस्या को और ज्यादा बढ़ा दिया है। भोपाल के विभिन्न गैस डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर्स और मुख्य दफ्तरों के बाहर हर दिन सुबह से ही उपभोक्ताओं की लंबी-लंबी कतारें देखी जा रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, रोजाना 500 से 600 लोग नए कनेक्शन की स्थिति जानने या नया सिलेंडर हासिल करने के लिए कतारों में लग रहे हैं।

विडंबना यह है कि घंटों इंतजार करने के बाद भी उन्हें अधिकारियों से सिर्फ एक ही रटा-रटाया जवाब मिलता है—'नो स्टॉक' या 'पीछे से ही सप्लाई बाधित है'। भोपाल में पाइपलाइन के जरिए रसोई गैस (PNG) सप्लाई करने की जिम्मेदारी संभाल रही प्रमुख कंपनी 'थिंक गैस' के सामने भी हालात बदतर हैं। कंपनी के पास बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी साफ नजर आ रही है, जिसके चलते वे बढ़ती मांग को पूरा करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।


अमेरिका-ईरान तनाव का बहाना: क्या यह कंपनियों का नया 'बिजनेस मॉडल' है?


जब इस किल्लत के कारणों को लेकर गैस कंपनियों के स्थानीय अधिकारियों से बात की जाती है, तो वे इसके पीछे वैश्विक राजनीति का हवाला देते हैं। अधिकारियों का दावा है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे माल (LPG/PNG कॉम्पोनेंट्स) की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है।

हालांकि, बाजार के जानकारों और आर्थिक विश्लेषकों का नजरिया इसके बिल्कुल उलट है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय संकट से ज्यादा गैस कंपनियों का एक सुनियोजित 'बिजनेस मॉडल' हो सकता है। कंपनियां जानबूझकर बड़े और सब्सिडी वाले 14.2 किलो के घरेलू कनेक्शनों को रोक रही हैं, ताकि बाजार में छोटे कमर्शियल सिलेंडरों की मांग को कृत्रिम रूप से बढ़ाया जा सके और सीधा मुनाफा कमाया जा सके।


छोटे सिलेंडर बेचकर चांदी काट रहीं गैस एजेंसियां, जनता की जेब पर डाका


एक तरफ जहां आम जनता नए कनेक्शन के लिए अधिकारियों के सामने गुहार लगा रही है, वहीं दूसरी तरफ शहर की गैस एजेंसियों ने चालाकी से बाजार में 5 किलो और 10 किलो के सिलेंडरों का भारी स्टॉक डंप कर दिया है। मजबूरी का फायदा उठाकर एजेंसियां उपभोक्ताओं को ये छोटे सिलेंडर ऊंचे दामों पर बेच रही हैं।

अगर कीमतों के गणित को समझें, तो यह सीधे तौर पर जनता की जेब पर डाका डालने जैसा है:

• 5 किलो का सिलेंडर: इसकी बाजार कीमत वर्तमान में लगभग ₹781 है।

• 10 किलो का सिलेंडर: इसकी कीमत लगभग ₹1585 तक पहुंच चुकी है।

यदि इसकी तुलना सामान्य 14.2 किलो वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर (जिसकी कीमत करीब ₹800-₹900 के आसपास होती है) से की जाए, तो प्रति किलो के हिसाब से यह गैस दोगुनी से भी अधिक महंगी पड़ रही है। इस सीधे आर्थिक बोझ ने भोपाल के मध्यमवर्गीय और दिहाड़ी मजदूर परिवारों का मासिक बजट पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है।


प्रशासन की चुप्पी और अनुत्तरित सवाल


इस पूरे गंभीर मामले पर जिला प्रशासन, खाद्य विभाग और गैस कंपनियों के उच्च प्रबंधन ने पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। जनता के बीच अब कई तीखे सवाल तैर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वाकई में अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों के कारण गैस और कच्चे माल की भारी किल्लत है, तो फिर एजेंसियों के पास 5 किलो और 10 किलो वाले सिलेंडरों का असीमित स्टॉक कहां से आ रहा है? बड़े सिलेंडरों के लिए गैस क्यों खत्म हो जाती है, जबकि महंगे छोटे सिलेंडरों के लिए सप्लाई हमेशा उपलब्ध रहती है?

फिलहाल इस विसंगति का जवाब किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या गैस एजेंसी के पास नहीं है। जब तक प्रशासन इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करता, तब तक भोपाल की जनता इसी तरह महंगे दामों पर ईंधन खरीदने और ब्लैक मार्केटिंग का शिकार होने के लिए मजबूर रहेगी।

बीमारियों को रखना है दूर? तो आज ही नोट कर लें आयुर्वेद के ये सदियों पुराने 'बारहमासा' नियम!

 हिंदू कैलेंडर के 12 महीनों में क्या खाएं और क्या न खाएं: उत्तम स्वास्थ्य के लिए पारंपरिक 'बारहमासा' नियम

सनातन परंपरा और आयुर्वेद में ऋतुचर्या (मौसम के अनुसार जीवनशैली) को बहुत महत्व दिया गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे पारंपरिक 'बारहमासा' के अनुसार, हिंदू कैलेंडर के सभी 12 महीनों के लिए विशेष खान-पान के नियम बताए गए हैं, जो बदलते मौसम में शरीर को बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं।

यदि आप भी प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रहना चाहते हैं, तो अपने दैनिक जीवन में इन नियमों का पालन कर सकते हैं:




1. चैत्र (मार्च-अप्रैल)


• क्या न खाएं: गुड़ का सेवन बंद कर दें।

• क्या खाएं: सुबह सूरज उगते ही भीगे या भुने हुए चने चबाएं।


2. वैशाख (अप्रैल-मई)


• क्या न खाएं: तेल या भारी-तले भोजन से परहेज करें।

• क्या खाएं: शरीर को ठंडा रखने के लिए बेल का रस (शरबत) पीएं।


3. जेठ (मई-जून)


• क्या न खाएं: राई (सरसों) या अत्यधिक गर्म तासीर वाली चीजों से बचें।

• विशेष सलाह: गर्मी से बचने के लिए दिन के समय लगभग 20 मिनट की छोटी नींद (पावर नैप) लें।


4. आषाढ़ (जून-जुलाई)


• क्या न खाएं: बेल का फल खाना बंद कर दें।

• विशेष सलाह: इस मौसम में सुस्ती छोड़ें और खेल-कूद या शारीरिक गतिविधियों में मन लगाएं।


5. सावन (जुलाई-अगस्त)


• क्या न खाएं: नींबू या अत्यधिक खट्टी चीजों का सेवन छोड़ दें।

• क्या खाएं: पेट और सेहत को दुरुस्त रखने के लिए बाल-हरड़ (हरितकी) का सेवन करें।


6. भादों (अगस्त-सितंबर)


• क्या न खाएं: मट्ठा, छाछ या दही (मही) का सेवन न करें।

• क्या खाएं: इस महीने में तीखी या कड़वी (तिक्त) चीजों का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है।


7. क्वार/आश्विन (सितंबर-अक्टूबर)


• क्या न खाएं: करेला खाने से पूरी तरह परहेज करें।

• क्या खाएं: इस महीने में गुड़ खाना दोबारा शुरू कर सकते हैं।


8. कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर)


• क्या न खाएं: दही खाना छोड़ दें।

• क्या खाएं: रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) बढ़ाने के लिए आंवले को अपनी डाइट में शामिल करें।


9. अगहन/मार्गशीर्ष (नवंबर-दिसंबर)


• क्या न खाएं: जीरे का सेवन कम या बंद कर दें।

• क्या खाएं: सर्दियों की शुरुआत के कारण तेल और घी से युक्त पौष्टिक भोजन अपनाएं।


10. पौष (दिसंबर-जनवरी)


• क्या न खाएं: धनिया (विशेषकर हरी धनिया) का सेवन छोड़ें।

• क्या खाएं: कड़ाके की ठंड में शरीर को ताकत देने के लिए गर्म दूध का सेवन (दुग्धपान) करें।


11. माघ (जनवरी-फरवरी)


• क्या न खाएं: मिश्री या ठंडी मीठी चीजों से दूरी बनाएं।

• क्या खाएं: शरीर को ऊर्जा और गर्मी देने के लिए घी से भरपूर खिचड़ी का आनंद लें।


12. फाल्गुन (फरवरी-मार्च)


• क्या न खाएं: चने का सेवन बंद कर दें।

• विशेष सलाह: मौसम के बदलाव के समय सुबह (प्रातःकाल) ठंडे या ताजे पानी से अवश्य स्नान करें।

निष्कर्ष:

पारंपरिक 'बारहमासा' के ये नियम हमें याद दिलाते हैं कि हमारे पूर्वजों का आयुर्वेद और ऋतुचर्या (Seasonal Diet) का ज्ञान कितना गहरा था। बदलते मौसम के साथ खान-पान में ये छोटे बदलाव करके हम मौसमी बीमारियों, सर्दी-खांसी और पेट की समस्याओं से बच सकते हैं। डिजिटल दौर में इस पारंपरिक ज्ञान को अपनाना एक स्वस्थ जीवन की ओर बेहतरीन कदम हो सकता है। 

(नोट: किसी भी बड़े आहार बदलाव से पहले अपने डॉक्टर या विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।)

करवा चौथ 2026: भोपाल में बादलों का साया, अगर न दिखे चांद तो सुहागिनें ऐसे पूरा करें व्रत

भोपाल में करवा चौथ पर बारिश का साया: अगर न दिखे चांद, तो सुहागिनें इस तरह खोलें अपना व्रत; जानें ज्योतिषीय उपाय


भोपाल: आज मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल समेत कई हिस्सों में मौसम का मिजाज बदला हुआ है। चक्रवाती तूफान के असर और मौसम विभाग के अलर्ट के चलते आसमान में घने बादल छाए हुए हैं और बारिश हो रही है। ऐसे में करवा चौथ का निर्जला व्रत रख रहीं सुहागिन महिलाओं के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि रात को बारिश या बादलों के कारण चांद नहीं दिखा, तो वे अपना व्रत कैसे पूरा करेंगी?

ज्योतिषाचार्यों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मौसम खराब होने की स्थिति में व्रती महिलाओं को परेशान होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। शास्त्रों में ऐसी परिस्थितियों के लिए बेहद सरल और पारंपरिक विकल्प बताए गए हैं, जिनका पालन करके व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न किया जा सकता है। 


भोपाल में चंद्रोदय का समय


पंचांग के अनुसार, भोपाल में चंद्रोदय (चांद निकलने) का संभावित समय रात 08:26 बजे है। यदि इस समय पर बादलों के कारण चांद सीधे नजर नहीं आता है, तो आप नीचे दिए गए तरीकों को अपना सकती हैं:


चांद न दिखने पर व्रत खोलने के 4 पारंपरिक उपाय


1. भगवान शिव के मस्तक के चंद्र दर्शन: भगवान शिव को 'चंद्रशेखर' कहा जाता है क्योंकि उनके मस्तक पर द्वितीय का बालचंद्र विराजमान है। यदि आसमान में चांद न दिखे, तो आप घर के मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर में दिख रहे चंद्रमा का ध्यान व पूजन कर सकती हैं। इसके बाद चंद्रदेव का स्मरण करते हुए अर्घ्य दें और व्रत का पारण करें।

2. चावल से बनाएं प्रतीकात्मक चांद: एक साफ थाली या चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और कच्चे चावल (अक्षत) की मदद से चंद्रमा की आकृति बना लें। इस प्रतीकात्मक चांद को छलनी से देखकर पूजा करें, 'ॐ सोमाय नमः' मंत्र का जाप करें और अर्घ्य देकर पति के हाथों जल ग्रहण करें।

3. चांदी के सिक्के की पूजा: ज्योतिष शास्त्र में चांदी का संबंध चंद्रदेव से माना गया है। आप एक साफ थाली में चांदी का सिक्का रखकर उसे चंद्रमा का प्रतीक मानकर रोली, अक्षत से पूजन कर सकती हैं और अर्घ्य की प्रक्रिया पूरी कर सकती हैं।

4. पंचांग के समय पर दिशा का ध्यान कर अर्घ्य: शास्त्रों के अनुसार, चंद्रमा का उदय होना और उसका दिखाई देना दो अलग बातें हैं। भले ही बादल चांद को छिपा लें, लेकिन चंद्रोदय अपने नियत समय पर हो जाता है। इसलिए पंचांग के समयानुसार (रात 8:26 बजे) पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके चंद्रदेव का मानसिक ध्यान करें, अर्घ्य दें और व्रत खोलें।


डिजिटल दौर का एक और विकल्प: वीडियो कॉल


आज के आधुनिक दौर में यदि भोपाल में मौसम ज्यादा खराब है और आपके किसी रिश्तेदार या मित्र के शहर में (जहाँ आसमान साफ हो) चांद दिख रहा है, तो आप वीडियो कॉल के जरिए भी चांद के दर्शन कर सकती हैं। वहां के चांद को देखकर आप अपने शहर के पंचांग समय के बाद अर्घ्य दे सकती हैं।

विशेष सलाह: सनातन धर्म और शास्त्रों के अनुसार, किसी भी व्रत का फल बाहरी परिस्थितियों से ज्यादा आपकी आंतरिक श्रद्धा, शुद्ध भाव और संकल्प पर निर्भर करता है। इसलिए मन में कोई संशय या डर न रखें और पूरी आस्था के साथ अपने त्योहार का आनंद लें।


इजराइल चुनाव 2026: क्या अब मुस्लिम पार्टियां चलाएंगी इजराइल की सरकार? नेतन्याहू संकट में!

 

इज़राइल चुनाव 2026: क्या अब मुस्लिम पार्टियां तय करेंगी यरूशलेम की सत्ता? नेतन्याहू की 'महाघेराबंदी' और अरब दलों का ऐतिहासिक उभार




यरूशलेम / नई दिल्ली: इज़राइल की सियासत में आज जो हुआ है, उसकी कल्पना कुछ साल पहले तक किसी ने नहीं की होगी। साल 2026 के आम चुनाव के नतीजों ने देश की राजनीति को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से आगे का रास्ता यहूदी राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि इज़राइल के मुस्लिम (अरब) नेता तय करेंगे।

शुरुआती आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि दुनिया के सबसे आक्रामक नेताओं में शुमार बेंजामिन नेतन्याहू इस बार बहुमत के जादुई आंकड़े (61 सीटें) से दूर रह गए हैं। लेकिन कहानी सिर्फ नेतन्याहू के पिछड़ने की नहीं है; असली कहानी उस 'किंगमेकर' की है जिसके बिना अब यरूशलेम की गद्दी पर बैठना नामुमकिन हो चुका है।



बुलेट नहीं, बैलट से पलटी बाजी: टूटे वोटिंग के सारे रिकॉर्ड


इस चुनाव ने इज़राइल के लोकतांत्रिक इतिहास को री-राइट (पुनर्लिखित) कर दिया है। 1999 के बाद पहली बार देश में 77.7% का बंपर मतदान दर्ज किया गया। सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब खुद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पोलिंग के दिन सोशल मीडिया पर मुस्लिम महिलाओं की कतारें पोस्ट कर दुनिया को दिखाया कि अरब इलाकों में क्या माहौल है।

विश्लेषकों का मानना है कि अरब आबादी का यही 'साइलेंट रेवोल्यूशन' (मौन क्रांति) दोनों बड़े यहूदी राजनीतिक गुटों पर भारी पड़ गया। जिस मुस्लिम आबादी को इज़राइल की सत्ता में अब तक हाशिये पर रखा जाता था, उसी के बंपर वोटिंग टर्नआउट ने बड़े-बड़े दिग्गजों के समीकरण ध्वस्त कर दिए।


किंगमेकर की भूमिका में अरब दल: क्या हैं 3 बड़े राजनीतिक समीकरण?


120 सीटों वाली इज़राइली संसद (नेसेट) में सरकार बनाने की चाबी अब पूरी तरह अरब दलों की जेब में है। चाहे मौजूदा पीएम बेंजामिन नेतन्याहू का दक्षिणपंथी धड़ा हो या उनके धुर विरोधी पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट का विपक्षी गठबंधन—दोनों में से कोई भी अरब पार्टियों को साधे बिना सरकार नहीं बना सकता।

मौजूदा हालात में ये तीन रास्ते दिखाई दे रहे हैं:

1. विपक्ष के साथ गठबंधन: मंसूर अब्बास की अगुवाई वाली अरब पार्टी 'राआम' (Ra'am) मुस्लिम अल्पसंख्यकों के अधिकारों और बड़े बजट की शर्तों पर विपक्ष के आइजेनकोट के साथ सरकार में शामिल हो सकती है।

2. बाहर से समर्थन का 'मास्टरस्ट्रोक': बड़ा अरब गुट 'जॉइंट लिस्ट' सरकार का हिस्सा बने बिना विपक्ष को बाहर से समर्थन दे सकता है। लेकिन उनकी एक बड़ी शर्त है—7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के दौरान हुई सुरक्षा चूक की जांच के लिए एक स्वतंत्र सरकारी आयोग का गठन।

3. नेतन्याहू का आखिरी दांव: सत्ता बचाने के माहिर खिलाड़ी नेतन्याहू खुद भी किसी एक अरब धड़े को अपने पाले में लाने के लिए बैकचैनल बातचीत शुरू कर सकते हैं।


अरब नागरिकों की मांगें: सत्ता के बदले स्वाभिमान


इज़राइल की कुल आबादी में लगभग 18 से 20 प्रतिशत हिस्सा अरब मुस्लिमों का है। अब जब वे किंगमेकर बन चुके हैं, तो उनकी मांगें भी बेहद स्पष्ट और जमीनी हैं:

• फंडिंग में बराबरी: अरब बहुल कस्बों और गांवों के विकास के लिए सरकारी बजट में बड़ी हिस्सेदारी।

• अवैध निर्माण पर राहत: मुस्लिम इलाकों में स्कूल, अस्पताल और पक्के मकान बनाने के परमिट की प्रक्रियाओं को आसान करना।

• सुरक्षा की गारंटी: अरब बस्तियों में पैर पसारते जा रहे क्राइम और आंतरिक गैंगवार पर लगाम लगाने के लिए सख्त पुलिसिंग।




क्या फिर चुनाव की ओर बढ़ेगा इज़राइल?


अब सबकी नजरें इज़राइल के राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग पर हैं, जो सरकार बनाने के लिए सबसे बड़े संभावित गठबंधन के नेता को आमंत्रित करेंगे। अगर अरब पार्टियों के साथ बात नहीं बनी और कोई भी दल 61 का आंकड़ा नहीं जुटा पाया, तो संसद भंग हो जाएगी और 90 दिनों के भीतर इज़राइल को फिर से चुनाव का सामना करना पड़ेगा। तब तक नेतन्याहू ही कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में देश की कमान संभालेंगे।