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भोपाल में गैस संकट: किल्लत का बहाना बना अटके 18 हजार कनेक्शन, दोगुने दाम पर छोटे सिलेंडर खरीदने को मजबूर लोग



भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में इन दिनों रसोई गैस उपभोक्ताओं को एक अभूतपूर्व और गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। गैस कंपनियों द्वारा कथित तौर पर 'रॉ मटेरियल की किल्लत' और 'अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों' का ढाल बनाकर पिछले 9 महीनों से नए एलपीजी (LPG) और पीएनजी (PNG) गैस कनेक्शनों की फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। सरकारी दावों और डिजिटल इंडिया के नारों के बीच जमीनी हकीकत यह है कि भोपाल के करीब 18,000 से अधिक परिवार एक अदद वैध गैस कनेक्शन के लिए महीनों से सरकारी और निजी गैस एजेंसियों के चक्कर काट रहे हैं।

गैस कंपनियों के इस लचर और उदासीन रवैये ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। सबसे ज्यादा मार उन नए परिवारों और प्रवासियों पर पड़ रही है जो हाल ही में शहर में बसे हैं। अपनी रसोई का चूल्हा जलाने के लिए उपभोक्ताओं के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है, जिसके कारण वे बाजार से दोगुने से भी अधिक दामों पर 5 किलो और 10 किलो वाले छोटे कमर्शियल सिलेंडर खरीदने को मजबूर हैं।


त्योहारों के सीजन में चरम पर पहुंचा संकट, दफ्तरों में मची है हाहाकार


वर्तमान में जारी त्योहारों के इस व्यस्त सीजन ने इस समस्या को और ज्यादा बढ़ा दिया है। भोपाल के विभिन्न गैस डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर्स और मुख्य दफ्तरों के बाहर हर दिन सुबह से ही उपभोक्ताओं की लंबी-लंबी कतारें देखी जा रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, रोजाना 500 से 600 लोग नए कनेक्शन की स्थिति जानने या नया सिलेंडर हासिल करने के लिए कतारों में लग रहे हैं।

विडंबना यह है कि घंटों इंतजार करने के बाद भी उन्हें अधिकारियों से सिर्फ एक ही रटा-रटाया जवाब मिलता है—'नो स्टॉक' या 'पीछे से ही सप्लाई बाधित है'। भोपाल में पाइपलाइन के जरिए रसोई गैस (PNG) सप्लाई करने की जिम्मेदारी संभाल रही प्रमुख कंपनी 'थिंक गैस' के सामने भी हालात बदतर हैं। कंपनी के पास बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी साफ नजर आ रही है, जिसके चलते वे बढ़ती मांग को पूरा करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।


अमेरिका-ईरान तनाव का बहाना: क्या यह कंपनियों का नया 'बिजनेस मॉडल' है?


जब इस किल्लत के कारणों को लेकर गैस कंपनियों के स्थानीय अधिकारियों से बात की जाती है, तो वे इसके पीछे वैश्विक राजनीति का हवाला देते हैं। अधिकारियों का दावा है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे माल (LPG/PNG कॉम्पोनेंट्स) की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है।

हालांकि, बाजार के जानकारों और आर्थिक विश्लेषकों का नजरिया इसके बिल्कुल उलट है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय संकट से ज्यादा गैस कंपनियों का एक सुनियोजित 'बिजनेस मॉडल' हो सकता है। कंपनियां जानबूझकर बड़े और सब्सिडी वाले 14.2 किलो के घरेलू कनेक्शनों को रोक रही हैं, ताकि बाजार में छोटे कमर्शियल सिलेंडरों की मांग को कृत्रिम रूप से बढ़ाया जा सके और सीधा मुनाफा कमाया जा सके।


छोटे सिलेंडर बेचकर चांदी काट रहीं गैस एजेंसियां, जनता की जेब पर डाका


एक तरफ जहां आम जनता नए कनेक्शन के लिए अधिकारियों के सामने गुहार लगा रही है, वहीं दूसरी तरफ शहर की गैस एजेंसियों ने चालाकी से बाजार में 5 किलो और 10 किलो के सिलेंडरों का भारी स्टॉक डंप कर दिया है। मजबूरी का फायदा उठाकर एजेंसियां उपभोक्ताओं को ये छोटे सिलेंडर ऊंचे दामों पर बेच रही हैं।

अगर कीमतों के गणित को समझें, तो यह सीधे तौर पर जनता की जेब पर डाका डालने जैसा है:

• 5 किलो का सिलेंडर: इसकी बाजार कीमत वर्तमान में लगभग ₹781 है।

• 10 किलो का सिलेंडर: इसकी कीमत लगभग ₹1585 तक पहुंच चुकी है।

यदि इसकी तुलना सामान्य 14.2 किलो वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर (जिसकी कीमत करीब ₹800-₹900 के आसपास होती है) से की जाए, तो प्रति किलो के हिसाब से यह गैस दोगुनी से भी अधिक महंगी पड़ रही है। इस सीधे आर्थिक बोझ ने भोपाल के मध्यमवर्गीय और दिहाड़ी मजदूर परिवारों का मासिक बजट पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है।


प्रशासन की चुप्पी और अनुत्तरित सवाल


इस पूरे गंभीर मामले पर जिला प्रशासन, खाद्य विभाग और गैस कंपनियों के उच्च प्रबंधन ने पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। जनता के बीच अब कई तीखे सवाल तैर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वाकई में अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों के कारण गैस और कच्चे माल की भारी किल्लत है, तो फिर एजेंसियों के पास 5 किलो और 10 किलो वाले सिलेंडरों का असीमित स्टॉक कहां से आ रहा है? बड़े सिलेंडरों के लिए गैस क्यों खत्म हो जाती है, जबकि महंगे छोटे सिलेंडरों के लिए सप्लाई हमेशा उपलब्ध रहती है?

फिलहाल इस विसंगति का जवाब किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या गैस एजेंसी के पास नहीं है। जब तक प्रशासन इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करता, तब तक भोपाल की जनता इसी तरह महंगे दामों पर ईंधन खरीदने और ब्लैक मार्केटिंग का शिकार होने के लिए मजबूर रहेगी।

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